बुधवार, 30 सितंबर 2015

गधे की फोटो (हास्य कथा)

(अपने जीवन की सच्ची घटना पर आधारित यह कहानी मैंने बारह-तेरह साल की उम्र में लिखी थी. कहानी 1994 में राजस्थान पत्रिका प्रकाशन की बाल पत्रिका बालहंस में प्रकाशित हुयी थी. इसे बाद में इसी प्रकाशन से 2010 में "हास्य कथाएँ" नामक हास्य कथा संकलन में सम्मिलित करके प्रकाशित किया गया.)

यह उस समय की बात है जब हमलोग मगरवारा में रहते थे. यह उन्नाव जिले के अंतर्गत आने वाला छोटा सा स्टेशन है. मेरे पिताजी यहाँ स्टेशन मास्टर थे और हमलोग उनके साथ रेलवे कॉलोनी में रहते थे.

मगरवारा गाँव के बीच स्थित है, इसलिए यहाँ गाँव जैसा ही वातावरण है. रेलवे कॉलोनी के लोग उस समय बहुत ही प्रेम से मिलजुलकर रहते थे. 

एक बार की बात है, कहीं से एक गधा चरते-चरते रेलवे कॉलोनी में आ पहुँचा. तभी किसी लड़के ने उस गधे के गले में बंधी पतली सी रस्सी पकड़ ली. गधे को इस बात की खबर भी न लगी कि उस लड़के ने उसे पकड़कर बाँध दिया है और वह आराम से घास चरता रहा.

अपने बरामदे में खड़ी होकर मैं यह दृश्य देख रही थी. वो लड़का गधे को बाँध कर चला गया था. मुझे उस गधे की फोटो खींचने की बात सूझी. तभी उधर से रमेश चाचा जो कि मगरवारा स्टेशन पर पोर्टर थे, आ पहुँचे. मैंने उनसे कहा 'चाचाजी, ज़रा आप इस गधे को पकड़े रहिये. मैं इसकी फोटो खीचूँगी.' 

रमेश चाचा ने आश्चर्य से पूछा 'गधे की फोटो?'

'हाँ, आप इसे पकड़िये तो मैं अभी कैमरा लाती हूँ' कहते हुए मैं तुरंत अंदर घर में आई और दीदी से अपने मन की बात कही. दीदी पहले तो हँसी, फिर कैमरा ले जाने की अनुमति दे दी. मैं कैमरा लेकर बाहर आ गयी. पीछे-पीछे मेरा भाई भी आ गया. बाहर निकली तो देखा कि रमेश चाचा गधे को पकड़े हुए हैं. मैंने खुश होकर कैमरा ठीक करना शुरू कर दिया. 

मुझे कैमरा लिए देखकर कुछ बच्चे और कुछ उधर से निकलने वाले ग्रामीण मुसाफिर भी उत्सुकतावश रूककर देखने लगे.तभी एक बच्चे ने पूछा, "दीदी, हम भी पकड़ लें गधे को." मैं समझ गयी कि गधा तो इनसे रुकने से रहा, असल में ये गधे के साथ अपनी फोटो खिंचवाना चाहते हैं. खैर, मैंने हाँ कर दी और कैमरा ऑन करके फोकस लगाने लगी.

उधर गधे जी ने जब अपने आसपास जमा भीड़ को देखा तो भड़क गए. मैंने चिल्लाकर कहा, "अरे चाचा जी, उसे ज़रा ज़ोर से पकड़िये, रस्सी पतली है. तुड़ाकर भाग जाएगा." चाचाजी ने उसे और मजबूती से पकड़ लिया और मेरी बात सुनकर और लोग भी गधे को पकड़ने आ गए. 

अब मेरे कैमरे में फ्लैश वाली बत्ती जल चुकी थी. मैंने फोकस भी ठीक कर लिया था. कैमरे के फ्रेम में उस समय वह गधा और उसे पकड़े हुए 12-13 आदमी और बच्चे दिखाई पड़ रहे थे, जिन्हें दरअसल अपनी फोटो खिंचवाने का ज़्यादा शौक था. अब वे लोग गधे को मजबूती से पकड़े हुए थे. कुछ लोग झुककर उसका पैर पकड़े थे, कुछ लोग पूंछ और कुछ लोग गले में बंधी रस्सी. गधे ने अपनी जान आफत में देखकर जोर-जोर से चिल्लाना आरम्भ कर दिया. लेकिन फोटो खिंचवाने वालों को इसकी कोई फ़िक्र नहीं थी. 

"रेडी" कहकर जैसे ही मैंने अपने कैमरे का बटन दबाया तो स्थिति यह बनी कि गधे को छोड़कर सब एकदम सीधे खड़े हो गए और गधा रफूचक्कर हो लिया.

जब फोटो बनकर आई तो मैंने सर पीट लिया. जिसकी फोटो खींचना चाहती थी, वह गधा तो उसमें था ही नहीं, हाँ, बारह-तेरह आदमी और बच्चे ज़रूर खींसे निपोरे सावधान खड़े थे. फिर भी वह फोटो आज भी सबको गधे की फोटो कहकर ही दिखाई जाती है :) 

-आराधना चतुर्वेदी मुक्ति 

3 टिप्‍पणियां:

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